Tuesday, June 26, 2012


चलते चलते नन्हे मुन्हे  पैर मेरे
थक जाते हैं, देखो न नानी माँ
मासी जब बुलाती है तो, भाग भाग के,
नहीं आने में मज़ा भी आता है ना,
पापा ने कहा नहीं की याद करते हैं
तो इतने मायूस से क्यों हैं माँ
नानाजी जब जाते हैं दफ्तर
हलचल मेरा मन होता है ज़रा
मैंने दूध का गिलास पटक दिया आज
मुझे कहीं डांटोगी तो नहीं ना
मैंने छुप के मिटटी खायी थी सुबह
गुस्सेवाली मासी ने देखा था क्या?




4 Comments:

Blogger Nitu Kumari said...

Wah kya baat kya baat. Wats up bhabhi. getting bored. Apki pari tou bahot bari hogayi hai.

29/6/12 03:01  
Blogger Nutan Singh said...

Thank you Nitu. Haan bahut badi ho gayi hai..jo bolo sab repeat karti hai. What happened? Call karo kabhi.

29/6/12 06:48  
Blogger Akhilesh Prasad Mishra said...

heya.. nyc one.. even i write, check dat on www.bleedingpen.tk

27/4/15 14:04  
Blogger shubham sharma said...

नूतन सिंह जी आपने यह लेख बहुत ही सहजता से एक बच्चे के भीतर उमड़ने वाले विचारों का वर्णन करते हुए बेहद खूबसूरती से लिखा है.......अब आप ऐसी ही कविताएं शब्दनगरी में भी लिख सकतीं हैं और अन्य पाठकों के लेखों का भी लुफ्त उठा सकतीं हैं |

25/5/16 02:57  

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